Gita Acharan
Bhagavad Gita is a conversation between Lord Krishna and Warrior Arjun.The Gita is Lord's guidance to humanity to be joyful and attain moksha (salvation) which is the ultimate freedom from all the polarities of the physical world.
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- Sep 8, 2026
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- Jul 3, 2026
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242. सभी गुणों से प्रभावित हैं (opens the original)
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श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में प्रकृति के तीन गुणों -सत्त्व, रजस् और तमस्, का विभिन्न प्रसंगों में विस्तार से वर्णन किया है। वे कहते हैं कि पृथ्वी पर या इस भौतिक जगत् के उच्चतर लोकों में कोई भी जीव ऐसा नहीं है जो इन तीन गुणों के प्रभाव से मुक्त हो (18.40)। इसका अर्थ यह है कि किसी भी समय हम किसी न किसी गुण के प्रभाव में रहते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं सभी परिस्थितियों में कर्म गुणों द्वारा ही संपन्न होते हैं; परंतु जो व्यक्ति अहंकार से मोहित होता है, वह सोचता है -‘मैं कर्ता हूँ’ (3.27-3.29)। जो ज्ञानी इ
241. सुख की रूपरेखा (opens the original)
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हमारे जीवन में सुख और दुःख की द्वैत स्थितियाँ निरन्तर अनुभव होती रहती हैं। श्रीकृष्ण ने कहा है कि जब इन्द्रियाँ अपने विषयों से मिलती हैंतब सुख-दुःख की द्वंद्व अवस्थाएँ उत्पन्न होती हैं (2.14)। प्रशंसा हमें सुख देती है जबकि निन्दा दुःख पहुँचाती है; यद्यपि दोनों ही केवल शब्दों के कानों सेटकराने की घटनाएँ मात्र हैं। इस प्रकार, जीवन इन्द्रियों और इन्द्रिय-विषयों के सतत संपर्क का परिणाम है जिससे स्पष्ट होता है कि सुख-दुःख का द्वंद्व मानवीय अस्तित्व की अपरिहार्य स्थिति है। श्रीकृष्ण सुख को तीन प्रकारो
240. बुद्धि और धृति (opens the original)
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कर्म और कर्ता के त्रिविध स्वरूप का वर्णन करने के बाद श्रीकृष्ण बताते हैं कि बुद्धि और धृति (धैर्य या साहस) भी गुणों के अनुसार त्रिविध हैं (18.29)। वे कहते हैं “जो बुद्धि यह जानती है कि सकाम कर्म और त्याग क्या है, क्या कर्तव्य है और क्या नहीं, क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, क्या भय है और क्या अभय, क्या बन्धन है और क्या मोक्ष -वह सात्त्विक कही जाती है (18.30)। जो बुद्धि धर्म और अधर्म में, कर्तव्य और अकर्तव्य में भ्रमित रहती है और उनमें भेद नहीं कर पाती -वह राजसिक कही जाती है (18.31)। जो
239. कर्ता और कर्म के तीन प्रकार (opens the original)
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कर्ता और कर्म को समझना जीवन के सबसे जटिल विषयों में से एक है। भगवद्गीता में इन जटिलताओं की व्याख्या कई स्थानों पर की गई है। श्रीकृष्ण चेतावनी देते हैं कि कर्म और अकर्म (निष्क्रियता) की सूक्ष्मताओं से ज्ञानीजन भी भ्रमित हो जाते हैं (4.16)। श्रीकृष्ण आगे समझाते हैं कि सृजन में सक्षम ब्रह्मांडीय ऊर्जा का पृथक्करण (बलिदान) (भूत-भाव-उद्भव-करो विसर्गः) कर्म कहलाता है (8.3) जो स्वयं में एक और गूढ़ विषय है। नियत कर्म भी भ्रम काएक कारण है। इसका समाधान बताते हुए श्रीकृष्ण कर्म करते हुए आन्तरिक समत्व बनाए
238. विचार से कर्म तक (opens the original)
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जब हम (ज्ञाता) किसी फूल (ज्ञान के विषय) को देखते हैं तो हम उसके रंग और सुगंध (ज्ञान) सहित अनेक गुणों को ग्रहण करते हैं। यह स्थिति एक कर्म को प्रेरित करती है। उदाहरण के लिए कोई कवि उस फूल की सुंदरता का वर्णन करते हुए कविता लिख सकता है। कवि कर्ता है, कलम उसका साधन(उपकरण) है, और कविता लिखना उसका कर्म है। इसी प्रकार कोई भक्त उसफूल को अपने इष्ट देवता को अर्पित करने के लिए तोड़ सकता है;कोई प्रेमी उसी फूल को अपने प्रियजन को देने के लिए तोड़ सकताहै; और कोई वनस्पतिशास्त्री (Botanist) उस फूल की प्रकृति का
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